Wednesday, 3 December 2014

श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन - एक सतत संघर्ष

यह एक स्थापित सत्य है कि मुग़ल आक्रंताओ ने बार-बार हिन्दुओ का दमन एवं उन पर इस्लाम की श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयत्न किया | उन्होंने हजारो मंदिर तोड़ेजिनमे से 4 पवित्र स्थान है : अयोध्यामथुराकाशी एवं सोमनाथ | मुगल आक्रंताओ ने इन सभी जगह पर मस्जिद जैसा ढांचा बनाने का प्रयत्न किया | इनमे से भगवान् सोमनाथ के मंदिर की पुन्रप्रतिष्ठा तो आज़ादी के बाद हो गयीकिन्तु शेष अभी खंडित रूप में है |


परमात्मा की यह शाश्वत घोषणा है कि 'जब-जब धर्म को समाप्त करने का कुचक्र रचा जायेगातब-तब वह स्वयं धरती पर आकर धर्म की स्थपना करेंगे और सज्जन शक्तियों का संरक्षण करेंगे' |

1526 में बाबर अयोध्या आया और सरयू के किनारे डेरा डाला | भारत पर विजय के लक्ष्य को लेकर वो अपने धर्मगुरु से मिला | उन्होंने बाबर को श्री रामजन्मभूमि के मंदिर को तोड़ने की सलाह दी | सन 1528 में अयोध्या में राम मंदिर को उसने तोड़ने का प्रयास किया लेकिन प्रचंड हिन्दू प्रतिकार के कारण सफल नहीं हुआ | इस कारण वहां न तो मीनार बन सकी और न ही वजू करने का स्थान | इसलिए निर्माण केवल एक ढांचा थामस्जिद कदापि नहीं |

जन्मभूमि को पुन: प्राप्त करने के लिए हिन्दुओ की ओर से सन 1528 से 1934 तक 76 युद्ध लड़े गये | 1934 का संघर्ष ऐसा समय था जब वहाँ मुस्लिम गये ही नहीं | अयोध्या में 1934 में एक गाय काट देने के कारण हिन्दू समाज में जबरदस्त आक्रोश फ़ैल गया था | गो हत्यारों को अपनी जान देनी पड़ी और कुछ हिन्दुओ का भी बलिदान हुआ | इतने उत्तेजित हिंन्दु समाज ने कथित बाबरी ढांचे पर आक्रमण कर इसके तीन गुम्बदो को क्षतिग्रस्त कर सम्पूर्ण परिसर को अपने अधिकार में ले लिया | लेकिन अंग्रेजो के चलते कब्ज़ा ज्यादा दिन नहीं रहा और गुम्बदो की मरम्मत के लिए अंग्रेजो ने हिन्दुओ से टैक्स वसूला | इस घटना के बाद न तो वहां कोई मुसलमान जाने की हिम्मत जुटा पाया और न ही वहां कभी नमाज पढ़ी गयी |

सतत संघर्ष का रूप आज़ादी के बाद 22 दिसम्बर, 1949 की अर्धरात्रि में देखने को मिला जब ढांचे के अन्दर भगवान् प्रकट हुए | इस प्राकट्य के पश्चात 6 दिसम्बर 1992 तक उसी स्थान पर विधिवत त्रिकाल पूजन आरती भोग होता रहा | जिसके लिए एक पुजारी को नियुक्त किया गया था | इस सब के पश्चात 7 अक्टूबर, 1984 से 6 दिसम्बर, 1992 तक का 77वाँ लोकतान्त्रिक चरणबद्ध संघर्ष चला |

प्रथम चरण: मार्च, 1983 में मुज्जफरनगर में हिन्दू सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमे श्री गुलजारी लाल नंदा और श्री दाऊदयाल खन्ना की विशेष उपस्थिति रही | इस सम्मलेन में श्री दाऊदयाल खन्ना जी ने अयोध्यामथुरा और काशी के तीनो धर्मस्थानों की मुक्ति का आग्रह श्रीमती इंदिरा गाँधी को पत्र लिखकर किया | इसके पश्चात सन 1984 में दिल्ली के विज्ञान भवन में प्रथम धर्मसंसद का अधिवेशन हुआ जिसमें 575 धर्माचार्यो की उपस्थिति रही | 7 अक्टूबर 1984 को अयोध्या में सरयू के किनारे ताला खुलवाने के लिए संकल्प सभा का आयोजन हुआ जिसमे लगभग 20 हज़ार संत एवं भक्त उपस्थित रहे | 8 अक्टूबर 1984 से लखनऊ के लिए पदयात्रा प्रारंभ हुई  और 14 अक्टूबर को लखनऊ के वाटिका पार्क में लगभग 5 लाख लोगो की उपस्थिति में विराट धर्मसभा हुई | अक्टूबर 1985 में उडुपी में द्वितीय धर्मसंसद हुई जिसमे 850 पूज्य धर्माचार्यों की उपस्थिति रही | संतो द्वारा महाशिवरात्रि 1986 तक ताला न खोलने पर अयोध्या में सत्याग्रह का निर्णय हुआ और दिगम्बर अखाड़े के श्रीमहंत परमहंस रामचन्द्रदास जी महाराज ने ताला न खोलने पर आत्मदाह की घोषणा की | इसके पश्चात 1 फरवरी, 1986 को जिला न्यायधीश श्री के.एम.पाण्डेय ने ताला खोलने का आदेश दिया |

द्वितीय चरण: पूज्य संतो ने विचार किया कि  केवल ताला खुलवाना हमारा मकसद नहीं बल्कि आक्रंताओ द्वारा जो अपमान हुआ उसका परिमार्जन होना चाहिए |  इसके बाद श्रीराम जन्मभूमि न्यास का गठन हुआ और मंदिर के प्रारूप की चयन प्रक्रिया शुरू हुई | जनवरी, 1989 में प्रयागराज महाकुम्भ के अवसर पर तृतीय धर्मसंसद का आयोजन हुआ और पूज्य देवराहा बाबा जी की उपस्थिति के साथ ही 10,000 संत और लाखो भक्त इसमें शामिल हुए |  इसके बाद प्रत्येक गाँव से एक शिला और प्रत्येक व्यक्ति से सवा रुपए लेने का अभियान आरम्भ हुआ |  2.75 लाख गाँवों में 6 करोड़ व्यक्तियों ने पूजन किया और 9 नवम्बर को शिलान्यास की घोषणा हुई | 16  18 अक्टूबर को मुस्लिम वक्फ बोर्ड द्वारा शिलान्यास रोकने के लिए दायर किये गये दोनों प्रार्थना पत्र लखनऊ पूर्णपीठ द्वारा अस्वीकार कर दिए गये | इसके बाद 1989 में दो याचिकाएं ( 1137 तथा 1152 ) सर्वोच्च न्यायालय में दायर हुई जिनको 27 अक्टूबर, 1989 को न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया | इसके बाद 8 नवम्बर, 1989 को गृह मंत्री बूटा सिंह व सैयद शहाबुद्दीन उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री नारायण दत्त तिवारी और अन्य प्रशासनिक अधकारियों की बैठक में लखनऊ में शामिल हुए | जिसके बाद शिलान्यास वाले मुकदमे में निर्णय हुआ कि विवादित भूमि की सीमा के बाहर शिलान्यास निश्चित समय और निश्चित स्थान पर होगा | 9 नवम्बर, 1989 को शिलान्यास स्थल पर खुदाई प्रारम्भ हुई और यह कार्य 10 नवम्बर, 1989 को बिहार के दलित बंधू कामेश्वर चौपाल द्वारा हजारो संतो व भक्तो की उपस्थिति में वेद मंत्र एवं शंख ध्वनि के मध्य संपन्न हुआ |  

शिलान्यास
11, नवम्बर 1989 को फैजाबाद के जिलाधीश ने आगे के निर्माण को रोकने का आदेश दिया और सब संत वापिस आ गए | जनवरी, 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह को विवाद सुलझाने के लिए संतो ने चार माह का समय दिया |

तृतीय चरण: अगस्त1990 में मंदिर के लिए पत्थर तराशने का काम शुरू हुआ | 2324 जून को हरिद्वार के भारत माता मंदिर में मार्गदर्शक मंडल की बैठक हुई और 30 अक्टूबर 1990 को मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा की घोषण हुई |  पूज्य संतो द्वारा हिन्दू समाज का आह्वान हुआ कि दीपावली में रामज्योति से ही दीपक जलाएं | अयोध्या में अरणि मंथन से प्राप्त अग्नि द्वारा प्रज्वलित राम ज्योति को सम्पूर्ण देश में पहुँचाया गया 


Ramjyoti
उत्तरप्रदेश सरकार ने ज्योति को राज्य में प्रतिबंधित कर दिया और कारसेवा रोकने के लिए यह घोषणा  की कि अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा” |  अयोध्या जाने वाली सभी ट्रेनबस रद्द कर दी गयी और 40 बटालियन पैरा मिलिट्री फ़ोर्स तैनात कर दी गयी | बड़ी-बड़ी खाई खोदी गई और कंटीले तार बाँध दिए गये | 23 अक्टूबर को भाजपा नेता लालकृष्ण आडवानी जी को बिहार में गिरफ्तार कर लिया गया | 


पत्रकारों ने कहा कि ढांचे पर कोई एक फावड़ा भी फेंक दे तो कारसेवा मान लेंगे |  इसे रामभक्तो ने चुनौती माना और चलो अयोध्या के नारे पर देशभर के लाखो कारसेवक अयोध्या की ओर चल पड़े | गाँव-गाँव में कारसेवको का स्वागत हुआ, भोजन आदि की वयवस्था श्रीराम की प्रेरणा से हुई | उत्तरप्रदेश में गिरफ्तारियां आरंभ हो गई और सब जिलो में जेले कारसेवको से भर गयी | 30 अक्टूबर को कारसेवा के दिन पूज्य स्वामी वामदेव, श्री अशोक सिंघल एवं श्री श्रीशचंद्र दीक्षित जी कारसेवा करने के लिए अयोध्या ही नहीं बल्कि ढांचे तक पहुँच गए |   
Shri Ashoke Singhal At Karsewa
31 अक्टूबर एवं नवम्बर को विश्राम के पश्चात नवम्बर को पुन: कारसेवक निकले | लेकिन सरकार का क्रूर चेहरा उजागर हुआ और सुनियोजित योजना के तहत कारसेवको पर गोलियों की बौछार हुई व नरसंहार के षड़यंत्र का क्रियान्वयन हुआ कोठारी बंधुओ सहित अनेको कारसेवक हुतात्मा हो गये मंदिर निर्माण के लिए 40 दिन का सत्याग्रह चला कारसेवको की अस्थिकलश यात्रायें प्रारंभ हुई और जनवरी 1991 में प्रयागराज में इन अस्थियों का विसर्जन हुआ 
 कोठारी बंधुओ सहित अनेको कारसेवक हुतात्मा हो गये

अप्रैल 1991 में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा दिल्ली में महारैली का आयोजन 25 लाख की ऐतिहासिक उपस्थिति के साथ हुआ उसी दिन विश्वनाथ प्रताप सिंह का पतन हो गया |

विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा दिल्ली में महारैली
चतुर्थ चरण: विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के पतन पश्चात श्री चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने और उन्होने वार्ता का सुझाव दिया | 1 दिसम्बर, 1990 को विश्व हिन्दू परिषद् बाबरी मस्जिद एक्सन कमेटी और सरकारी प्रतिनिधियों की बैठक में वार्ता प्रारंभ हुई | 4 दिसम्बर, 1990 को दूसरी बैठक में तत्कालीन गृह राज्यमंत्रीउत्तरप्रदेशमहाराष्ट्र और राजस्थान के मुख्यमंत्री व श्री भैरो सिंह शेखावत उपस्थित रहे सोहार्दपूर्ण समाधान के लिए यह निर्णय हुआ कि दोनों पक्षों के लोग 22 दिसम्बर 1990 तक अपने साक्ष्य गृह राज्यमंत्री को उपलब्ध कराएँ दोनों को एक दुसरे के साक्ष्यो का प्रत्युत्तर जनवरी 1991 तक देना था विश्व हिन्दू परिषद् ने बाबरी मस्जिद एक्सन कमेटी के दावो को निरस्त करते हुए प्रत्युत्तर दिया जबकि कमेटी ने केवल अपने पक्ष को और अधिक प्रमाणित करने वाली फोटोप्रतियां दी | 10 जनवरी, 1991 को गुजरात भवन में बैठक हुई और निर्णय लिया गया कि प्रस्तुत दस्तावेजो को ऐतहासिकपुरातात्विकराजस्व और विधि शीर्षक के अन्तरगत वर्गीकरण कर लिया जाए यह भी तय हुआ कि दोनों पक्ष अपने विशेषज्ञो के नाम देंगे जो संबंधित दस्तावेजो का अध्ययन करके 24,25  26 जनवरी को मिलेंगे और अपनी टिप्पणी फरवरी, 1991 तक देंगे लेकिन बाबरी मस्जिद कमेटी ने अपने नाम दिए ही नहीं | 24 जनवरी को जो विशेषज्ञ आये वो कमेटी की कार्यकारिणी के पदाधिकारी थे | 25 जनवरी की बैठक में भी कोई नहीं आया जबकि विश्व हिन्दू परिषद् के प्रतिनिधि और विशेषज्ञ घंटे तक इंतज़ार करते रहे वार्ताओ का दौर 25 जनवरी 1991 तक चला अंतत: वार्तालाप बंद हो गयी |

विश्व हिन्दू परिषद् के प्रतिनिधि और सरकारी प्रतिनिधि
देश में आम चुनाव हुए और नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने जून 1992 में ढांचे के सामने समतलीकरण हुआ और अनेको प्राचीन मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए |  जुलाई 1992 में सर्वदेव अनुष्ठान हुआ और मंदिर के चबूतरे का निर्माण हुआ लेकिन प्रधानमंत्री ने काम रोकने के लिए संतो से निवेदन किया | सम्पूर्ण देश में विजयादशमी 6 अक्टूबर 1992 से दीपावली 25 अक्टूबर तक श्री राम चरण पादुका पूंजा कार्यक्रम हुआ | जिसके माध्यम से कारसेवको की भर्ती की गई | 30 अक्टूबर, 1992 को दिल्ली में पांचवी धर्मसंसद में 6 दिसम्बर 1992 को पुन: कारसेवा की घोषणा हुई | इसके पूर्व उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा अधिग्रहित 2.77 एकड़ भूखंड में उच्च न्यायालय का निर्णय आने की अपेक्षा थी लेकिन निर्णय सुनाने की तिथि 11 दिसम्बर, 1992 घोषित हुई |  लेकिन प्रथम कारसेवा के मार्गो के अवरुद्ध होने के अनुभव के कारण 6 दिसम्बर की घटना को टाला नहीं जा सकता था यही ईश्वरीय इच्छा थी |


इतिहास अचानक घटित होता है न कि योजनापूर्वक लिखा जाता है | ढांचा 5 घंटे में ही सरयू में प्रवाहित हो गया | कारसेवको ने आनन-फानन में तिरपाल का मंदिर बनाया और पुन: वहां रामलला विराजमान हो गए | 8 दिसम्बर, 1992 को ब्रह्म मुहर्त में केंद्रीय सुरक्षा बलों ने सम्पूर्ण परिसर को अपने कब्जे में ले लिया | सुरक्षा बलो की देखरेख में पुजारी द्वारा पूजा होने लगी | 21 दिसंबर, 1992 को अधिवक्ता श्री हरिशंकर जैन द्वारा उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका पर न्यायमूर्ति श्री हरिहरनाथ और श्री ए.एन. गुप्ता की खंडपीठ ने 1 जनवरी. 1983 को अपने निर्णय द्वारा हिन्दू समाज को आरतीदर्शनपूजा-भोग का अधिकार दे दिया |

1937 में उठे श्रीराम जन्मभूमि विवाद पर अपने पत्र में महात्मा गाँधी जी ने लिखा था – “धार्मिक दृष्टिकोण से एक मुसलमान यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता कि उसकी मस्जिद मेंजिसमे वह बराबर खुदा की इबादत करता आ रहा हैकोई हिन्दू उसमे बुत ले जाकर रख दे | उसी तरह एक हिन्दू भी कभी यह सहन नहीं करेगा कि उसके उस मंदिर मेंजहां वह बराबर रामकृष्णशंकरप्रभु और देवी की उपासना करता चला आ रहा हैकोई उसे तोड़कर मस्जिद बाना दे | जहां पर ऐसे काण्ड हुए हैवास्तव में ये चिन्ह धार्मिक गुलामी के है” | 






Wednesday, 25 June 2014

आम चुनाव और संघ की भूमिका

देश में सम्पन्न हुए आम चुनावों ने पूर्ण बहुमत वाली पहली गैर-कांग्रेसी सरकार देश को देकर एक नया इतिहास रच डाला | महंगाई, बेरोजगारी और लाचार कानून व्यवस्था के खिलाफ नागरिको का गुस्सा वोट के रूप में उभर कर बाहर आया | चूँकि देश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार भाजपा के नेतृत्व वाली बनी विचारो के आधार पर कई समाजिक संगठनो और संस्थाओ को प्रतिद्वंदी पार्टियों द्वारा निशाना बनाया गया | इसमें सबसे ऊपर नाम है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का | आरोप लगे कि संघ ने चुनाव में एकमात्र हिन्दुत्ववादी दल होने के कारण भाजपा का समर्थन किया | लेकिन संघ अपनी स्थापना के समय से ही सत्ता संघर्ष और राजनीतिक दलबंदी से दूर रहा है | संघ राष्ट्रनितियों के पीछे जरुर है परन्तु सक्रिय राजनीति में कभी हस्तक्षेप नहीं करता | लेकिन जब संकट उत्पन्न होता है तब राष्ट्रहित के नाते चिंता करनी पड़ती है | संघ सम्पूर्ण समाज है, अपनी यह व्यापक भूमिका रखते हुए राजनीतिक क्षेत्र के बारे में सोचने की आवश्यकता हुई | 

                         

डॉ. हेडगेवार जी के समय में जब रैमसे मैकडोनाल्ड ने भारत शासन अधिनियम-1935 के अंतर्गत सांप्रदायिक निर्णय दिया तो गाँधी जी की और कांग्रेस की स्थिति बड़ी विडंबनापूर्ण हो गयी | वह निर्णय स्पष्ट रूप से राष्ट्रविरोधी था इसलिए उसको स्वीकारना संभव नहीं था | इसलिए कांग्रेस ने चुनाव के समय यह नीति अपनायी कि वह सांप्रदायिक निर्णय को न तो स्वीकार करती है और न अस्वीकार | क्योंकि अस्वीकार कर देने से उनको मुसलमानों के नाराज़ होने का डर था | अब इस बात का क्या अर्थ ? आपके घर में चोर घुस आया और आप न स्वागत कर रहे है और न बाहर निकाल रहे है | तब उस समय संघ के स्वयंसेवकों ने राष्ट्रवादी होने के कारण श्री मालवीय जी की नेशनलिस्ट पार्टी और हिन्दू महासभा का खुलेआम काम किया | संघ ने संघ के नाम से कोई वक्तव्य नहीं दिया | एक विशेष परिस्थिति में एक विशेष समस्या को लेकर हमने काम किया है |


इसी प्रकार जब इंदिरा गाँधी जी ने जनवरी 1977 में अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते चुनाव की घोषणा की तो केवल भूमिगत आंदोलन और सत्याग्रह ही नहीं लोकतंत्र की रक्षा के लिए लोकतान्त्रिक शक्तियों को एकजुट करने का कार्य भी संघ के स्वयंसेवकों ने किया | श्री दत्तोपंत ठेंगडी और प्रो. रज्जू भैया जी के प्रयास से जनता पार्टी के रूप में चार दल एक साथ चुनाव में उतरने को तैयार हो सके | आपातस्थिति के विरुद्ध संघर्ष की जिम्मेवारियां सँभालने वाले औरलोक शक्ति जागृत करने वाले 60% लोग संघ के स्वयंसेवक ही थे | जिसके कारण इंदिरा जी ने संघ के नेतृत्व से सौदेबाजी के प्रयास किये और कहा – “संघ से प्रतिबन्ध हटा कर सभी एक लाख से अधिक स्वयंसेवकों को जेलों से मुक्त किया जा सकता है, यदि संघ इस आन्दोलन से अलग हो जाए |” लेकिन संघ ने आपातकाल हटाकर लोकतंत्र बहाली से कम कुछ भी स्वीकार नहीं किया | उस समय लाखो स्वयंसेवकों और उनके परिवारों, सहयोगियों के संबल से आपातकाल में कुचली जनता ने अपना आक्रोश व्यक्त किया | चुनाव में इंदिरा जी और उनको समर्थन कर रही कम्युनिस्ट पार्टी बुरी तरह से हारी | जब राजनीति का काम राष्ट्रनीति में बाधा डालना हो जाता है तब स्वयंसेवक विवशता में तात्कालिक रूप से कार्य करते है |


इन चुनावो में भी संघ ने शत प्रतिशत मतदान के लिए आह्वान किया और प्रत्यासी के चरित्र और उसकी योग्यता के आधार पर वोट डालने के लिए कहा | लेकिन संघ का यह आन्दोलन किसी पार्टी या व्यक्ति विशेष के लिए नहीं बल्कि राष्ट्रीय परिपेक्ष को सामने रखकर था |


कुछ लोग कहते है नरेन्द्र मोदी चुनाव प्रचार समाप्त होते ही संघ प्रमुख से इसलिए मिलने गए की सरकार बनने के बाद संघ के लोग यह तय करेंगे कि कौन मंत्री बनेगा और कौन नहीं | ऐसा नही है, लेकिन यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि राजशक्ति पर लोकशक्ति का दबाव आवश्यक है | जनता में जागृति नहीं, राष्ट्रीय चेतना का स्तर नहीं तो फिर राजसत्ता ठीक चलेगी इसकी कोई गारंटी नहीं | संघ राष्ट्रीय चेतना से परिपूर्ण भारत माता के चरणों में समर्पित संगठन है | जब संघ की शक्ति बढ़ती जाएगी, जब संघ समाज रूप हो जायेगा तब संघ का मार्गदर्शन प्राप्त करने हेतु केशव कुञ्ज में आने वालो की संख्या बढ़ती जाएगी | संघ अपने आने वाले हर नव आगंतुक का स्वागत करता है |

Saturday, 12 April 2014

What Narendra Modi's home District - Mehsana is known for ?

Modi Ji belongs to a district called—Mehsana located in the North Gujarat. 

Milk:

The district is known for its local “Mehsani” breed of buffalos. These buffalos are most milk producing among all buffalo categories.

The Mehsana District Cooperative Milk Producers’ Union Ltd., popularly known as Dudhsagar Dairy. Dudhsagar Dairy is the largest dairy in Asia, processing on an average 1.41 million kilograms of milk each day. It has established a network for procuring milk from 4,500,000 milk producers through 1150 village milk cooperatives.
Dudhsagar dairy  provides 10 lacs liters of milk to Delhi daily through trains and its two satellite diary plants. These two satellite plants are located in Dharuhera industrial estate and Manesar.

Oil and natural gas

Established in November 1967, the Mehsana fields are one of the highest onshore-producing asset of the ONGC. Covering an area of 6000 km2 with 28 fields in 2007–2008. Mehsana also has 1311 oil wells and 16 gas wells producing 5800 tonnes per day.

Spices

Mehsana district’s town—Unjha is known as biggest spices and oil seed market of Asia. The APMC market of Unjha is the place where all farmers and traders from states like Rajasthan, Gujarat, Saurashtra come to trade and sell spices and oil seeds like cumin seedsfennel seedsfenugreek seedsdill seedsajwain seedsMustard SeedsSesame seedsCoriander Seeds etc.
The annual volume of total trade is $ 353203384.33 (USD) for the financial year 2012-2013. It export spirces in coutries such as 
USAGermanyCentral AmericaNew ZealandPortugalPoland, and European countries.

Sun Temple:

A Modhera Sun Temple is one of the two most important sun temples in the country is located in Modhera village.

Politics:

In 1984, the BJP won only two Lok Sabha seats in the elections. Even A.B. Vajpeyee and all leaders lost these elections. Mehsana gave a seat to BJP.

Hindutva Laboratory:

Mehsana is knowns a Hindutva laboratory. This district sets a tone for any political party to win elections.

Education:

Mehsana has an average literacy rate of 84.26%, higher than the national average. Male literacy is 91.88%, and female literacy is 76.12%.
Meshana is known for its science and math education. A majority of math and science teachers in Gujarat are from Mehsana districts. Also thousands of doctors and engineers are working in various countries from this district.


Thursday, 13 March 2014

संघ को बदनाम करने का राजनीतिक षड़यंत्र

खंडित होकर स्वतंत्र हुए भारत के सामने सबसे पहला पीड़ादायक प्रसंग महात्मा गाँधी की जघन्य हत्या के रूप में प्रस्तुत हुआ आजादी के बाद देश के विकास में सभी राष्ट्रभक्त शक्तियों का सहयोग लेकर आगे बढ़ने का दायित्व सत्ताधारीयों पर था किन्तु गाँधी हत्या का प्रयोग सरकार ने अपनी दलगत राजनीति की स्वार्थपूर्ति में किया गाँधी हत्या से एक दिन पहले दिनांक 29 जनवरी 1948 को प्रधानमन्त्री पं. नेहरू ने अमृतसर की सभा में घोषणा की थी कि ‘हम संघ को जड़-मूल से नष्ट करके ही रहेंगें। यह संघ को कुचल डालने का षडयंत्र था। संघ पर गाँधी हत्या का आरोप लगाकर बिना किसी सबूत के 4 फरवरी 1948 को संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। देशभर में भयानक विषाक्त वातावरण फैलाया गया। हिंसालूटपाट व आगजनी का तांडव सर्वत्र भड़काया गया । समाज विरोधी सारी शक्तियों को खुली छूट दे दीपरिणाम स्वरूप देशभर में मानवता चीत्कार करने लगी और पशुता हुंकारने लगी। विदेशी ब्रिटिश शासन भी जिस निम्न स्तर पर नहीं उतरा थाउससे भी नीचे उतरकर दमन चक्र चलाया गया। 

लेकिन वास्तविकता न्यायिक प्रक्रिया में सामने आ गई। 30 जनवरी 1948 को गाँधी जी की हत्या हुई थी। हत्या करने वाले नाथू राम गोडसे ने पिस्तौल सहित समर्पण कर दिया और जाँच में सामने आया की हत्या में चंद लोग शामिल थे। आरोपी बनायें गए संघ के वर्तमान सरसंघचालक श्री गुरु जी गोलवलकर पर से हत्या का आरोप 6 फरवरी 1948 को सरकार हटाने पर मजबूर हो गई 

26 फरवरी को जाँच के प्रति असंतोष व्यक्त करते हुए नेहरु जी ने सरदार पटेल को पत्र लिखा। पत्र के उत्तर में सरदार पटेल ने प्रधानमंत्री नेहरु को लिखा – ‘ गाँधी जी की हत्या के संबंध में चल रही कार्यवाही से मै पूरी तरह अवगत हूँ। यह बात भी असंदिग्ध रूप से उभर कर सामने आई है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इससे कतई संबंध नहीं है 

मामला विशेष अदालत में पंहुचा। आई.सी.एस कैडर के न्यायमूर्ति अत्माचरण की विशेष अदालत में दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले में 26 मई से सुनवाई शुरू हुई। अभियोजन पक्ष ने 8 अभियुक्तों के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत किये। ये थे – नाथूराम गोडसे और उसके भाई गोपाल गोडसेनारायण आप्टेविष्णु करकरेमदनलाल पाहवाशंकर किस्तैयादत्तात्रेय परचुरे और स्वतंत्रता सेंनानी विनायक दामोदर सावरकर। दिगंबर बागडे सरकारी गवाह बन गया 

110 पेजों का निर्णय 10 जनवरी 1949 को सुनाया गया। निर्दोष सावरकर जी को ससम्मान रिहा कर दिया गया। नाथूराम गोडसे व नारायण आप्टे को फांसी और शेष 5 को आजन्म कारावास की सजा सुनाई गई। न्यायमूर्ति आत्माचरण ने निसंदेह यह घोषणा की कि इस षड्यंत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई संबंध नहीं है 

न्याय प्रक्रिया में चारो पक्ष- सरकारी पक्षसफाई पक्षअभियुक्त पक्ष और न्यायधीश किसी ने भी संघ से इस काण्ड का संबंध नहीं जोड़ा। सरकार की ओर से प्रस्तुत वरिष्ठ अधिवक्ता श्री दफ्तरी ने पुरे मुकदमे में संघ का उल्लेख तक नहीं किया 

इसके पश्चात पंजाब उच्च न्यायलय में हुई अपील में परचुरे और किस्तैया को बरी कर दिया गया और नाथू राम गोडसे और आप्टे को15 नवम्बर 1949 को फांसी दे दी गई। विशेष न्यायलय और उच्च न्यायलय के निर्णय में भी संघ को निर्दोष घोषित कर दिया गया। परन्तु संघ विरोधी षड्यंत्र चलते रहे 



इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गाँधी जी की हत्या के 19 वर्षो बाद 1966 में नए सिरे से न्यायिक जाँच हेतु जस्टिस श्री टी.एल कपूर की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन हुआ। गठित आयोग ने 101 साक्ष्यो के बयान दर्ज किये तथा 407 दस्तावेज़ी सबूतों की जाँच पड़ताल कर 1968 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। कपूर आयोग के समक्ष सबसे महत्वपूर्ण सरकारी साक्ष्य – गाँधी हत्या के समय केंद्रीय सचिव श्री आर.एन.बेनर्जी थे – ‘ जिन्होंने सपष्ट रूप से स्वीकारा – “ गाँधी के हत्यारे संघ के सदस्य नहीं थे” इसके बाद आयोग ने संघ विरोधी और सत्ताधारियों की इस मान्यता को नकार दिया कि गाँधी जी की हत्या में संघ का हाथ था और राष्ट्रव्यापी षड़यंत्र रचा गया था 

मध्यप्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र ने अपनी आत्मकथा ‘ लिविंग एन इरा ’ के द्वितीय खंड के पृष्ठ 59 पर लिखा है कि – “ इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि गाँधी जी की हत्या ने स्वार्थी राजनेताओ के हाथ में अपने विरोधियो को बदनाम करने तथा यदि संभव हो तो उन्हें नेस्तनाबूद करने का हथियार दे दिया है

यह बात बड़ी दिलचस्प है कि संघ पर से प्रतिबन्ध हटाते समय नेहरु सरकार ने संघ पर लगाए गए आरोपों की चर्चा भी नहीं की 

प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने लोकसभा के एक प्रश्न के उत्तर में स्वीकार किया कि गाँधी हत्या में संघ का कोई हाथ नहीं है 

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है की तीन-तीन न्यायलयों के निर्णयों के बाद भी न्यायपालिका के सम्मान की दुहाई देने वाले आजतक इस झूठ को बार-बार दोहराते है 


Thursday, 6 February 2014

A political conspiracy against RSS

The concept of Hindu terror is nothing but a political conspiracy against the Sangh and its senior leaders. The intention of the entire drama is to implicate RSS leaders. This is not the first time that such allegations are being made. 

Swami Aseemanand, accused in the blasts in the Samjhauta Express, Hyderabad Mecca Masjid and Ajmer Dargah, has alleged that RSS chief Mohan Bhagwat had sanctioned these attacks, reported a magazine.

NIA sources say during probe Aseemanand did not name any senior RSS leader. ( India Today Report Feb 6, 2014 )

The Caravan’, A magazine of Delhi Press Mentioning Aseemanand claimed that the attacks on the Samjhauta Express, Hyderabad’s Mecca Masjid and Ajmer Dargah, and the blasts in Malegaon in 2006 and 2008, were cleared by the highest levels of the RSS.

Meanwhile, Swamy Aseemanand’s lawyer also rejected the Caravan report and denied that the interview ever took place. He has warned a legal action against the magazine.


Swami Aseemanand emphatically denies to have had any close door meeting with senior leaders of the alleged social organization i.e. RSS in year 2005 or afterwards. Swami Aseemanand challenges the correspondent to prove the truth of the allegations or apologize forthwithSource: VSK  

Ganesh Sovani, an advocate for Sadhvi Pragya Singh Thakur, an accused in the Malegaon case, said, “The ultimate objective of such probes is to ban the RSS. The Congress through the NIA will do whatever it takes to get the RSS banned.”

Sushil Kumar Shinde, Digvijay Singh asked to Bhavesh Patel to Implicate RSS :
Ajmer Blast Accused Bhavesh Patel alleged that National Investigation Agency was allowed to probe him inside the Alwar central jail illegally. “I am under pressure to implicate my co-accused and the NIA has been dictating terms to me,” he said.
The accusations have come after he wrote a letter to the CBI saying that he was pressured by Home Minister Sushilkumar Shinde, Congress General Secretary Digvijay Singh and others to implicate the Rashtriya Swayamsevak Sangh in the case.
Prior to Patel’s allegations, two other accused Mukesh Vasani and Raj Singh had accused the NIA of offering them Rs 1 crore to name RSS leaders in the Sunil Joshi murder case. 

Senior advocate and former state public prosecutor of Karnataka H S Chandramouli said, “The CBI or any other agency cannot brush aside such allegations. The CBI is likely to interrogate Narendra Modi’s aide Amit Shah in the Ishrat Jahan encounter case on the basis of allegations made by jailed IPS officer D G Vanzara. So why should the same rule of law not apply here?  The law mandates that every allegation be probed.”



Now look at the evidence, first on the blast on Samjhauta Express from Pakistan in which 68 persons were killed.

LeT culprit, says UN, US
“Qasmani Arif chief coordinator of the relations of [LeT] with other organizations...has worked with Lashkar-e-Tayyiba to facilitate terrorist attacks including.....the bombing of February 2007 in the Samjhauta Express in Panipat (India).” This is what resolution [No 1267] of the Committee on Sanctions of the United Nations Security Council [UNSC] dated 29.6.2009 declares. Adding that Qasmani was funded by Dawood Ibrahim and he did fund raising for LeT and Al-Qaida, the UNSC said: “In exchange for their support, Al-Qaida provided support staff for the bombing in February 2007 in the Samjhauta Express in Panipat.” This resolution is available on UN site. The UNSC & the US Treasury department thus named that LeT, Qasmani and Dawood Ibrahim as accused in Samjhauta terror. This is just beginning of the torrent of evidence pointing to LeT and Pakistan.

Pak minister’s confession
Six months after the UN and the US announced sanctions against LeT and Qasmani, the Pakistan Interior Minister Rehman Mallik himself admitted that Pakistani terrorists were involved in the Samjhauta blast, but with a rider that “some Pakistan-based Islamists had been hired by Lt Col Purohit to carry out the Samjhauta Express attack.” [India Today Online 24.1.2010]

Headley involved in Samjhauta – US probe
Not just UN or US Treasury or just the admission of Pakistan’s interior minister, in fact, independent investigation in US revealed more. Some ten months later, Sebastian Rotella, a US journalist, wrote in his investigative report titled, “U.S. agencies were forewarned about suspect in 2008 Mumbai bombings” that Faiza Outalha, the third of wife of David Coleman Headley had confessed [in 2008, that was made public in 2010] that Headley was involved in Samjhauta blast. 

Narco test pointed to SIMI role

Even at the start of the Samjhauta investigation in 2007 itself the probe evidence had clearly pointed to the role of Students Islamic Movement of India [SIMI] and LeT. India Today [19.9.2008] in its report titled ‘Pak hand in Mumbai train blast’s, Samjhauta Express blasts, says Nagori gave meticulous account of the involvement of LeT and Pakistan in the Samjhauta terror. The report was based on narco test testimonies of SIMI leaders. India Today said that narcotic tests were carried out in Bangalore, in April 2007, three months after the Samjhauta blast.
it revealed that SIMI activists had executed the Samjhauta blast, with the help of the Pakistani nationals from across the border; while Nagori was not directly involved, two members of SIMI Ehtesham Siddiqui and Nasir were directly involved; SIMI members, including Nagori’s brother Kamaruddin, were involved in the Samjhatua blast.

Conspiracy by Maharastra police?
Why were these clinching pieces of evidence not pursued? How the blame shifted from Islamists to Hindus? Some elements in the Maharashtra police appears to have colluded in linking Malegaon 2008 blast to the Samjhauta blast.

When leads were thus pointing to Pakistan and SIMI as partners in Samjhauta blast, in November 2008, as an anti climax, the Maharashtra Anti Terror Squad [ATS] shockingly told the Special Court through the public prosecutor, that Col Purohit, allegedly involved in the Malegaon blast in which RDX was used, had supplied RDX for the Samjhauta blast though one ‘Bhagwan’. [The Indian Express 15.11.2008] within the next 48 hours [17.11.2009] India Today online refuted the ATS claim saying that Samjhauta investigators had told India Today that study of the blast carried out by the National Security Guard said that no RDX, but Pottasium Cholorate and Sulphur had been used as explosives. The magazine also recalled that immediately after the blasts, then Home Minister Shivraj Patil told the media that not RDX, but, a ‘new type of explosive’ had been used to bomb the Samjhauta Express. On that very day [17.11.2009] the ATS counsel retracted from the statement he had made earlier involving Col Purohit in the Samjhauta blast. [The Hindu dt19.11.2008]. But damage was done in the 48 hours. Immediately Pakistan said that it would raise the issue of Purohit’s involvement in Samjhauta in the Secretaries level meeting on November 25, 2008. Finally on January 20, 2009, Maharastra ATS officially denied that Col Purohit had supplied RDX for Samjhauta. This was how the Samjhauta focus – later the blame – shifted from LeT and SIMI to Purohit and via Purohit on to saffron.

The Maharashtra ATS attempt to link Malegaon 2008 to Samjhauta which shifted the focus away from LeT on to Purohit needs to be probed, particularly given Dawood Ibrahim’s deep influence in Maharastra Police.

If Shinde is telling the truth, then United Nations Security Council and the US Treasury Department are fabricating charges against Qasmani, Dawood and LeT; Faiza Outallah and Washington Post are telling lies to fix LeT and Pakistan; the SIMI officials’ narco evidence is fabricated; and Rehman Mallik’s confession about Pakistani involvement is false. Can it be more ridiculous? It is clearly the lies of Shinde, the vote-bank politician versus all neutral evidence. If this was how the Samjhauta probe was perverted, in Malegaon 2006 blast the Maharashtra ATS has filed a charge sheet where SIMI cadre has confessed to their role in the blast. But the CBI is procuring confessions to exonerate them and implicate others, Hindus in the case.  So Malegaon 2006, is becoming a case of confession vs confession! In Malegaon 2008, blasts Col Purohit and his associates have been charged and the evidence produced to the Court shows that the accused in the Malegaon 2008 case were planning to assassinate the RSS chief Mohan Bhagwat and Indresh Kumar for taking money from ISI! [Outlook 19.7.2010] How could the RSS which is the target of the conspirator itself be a conspirator ? Does Shinde know what he is talking ? 

The entire episode smacks of a sinister conspiracy for political gains. We hope that the judiciary would take cognisance of the matter and conduct an honest and genuine probe.






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इस समय शिक्षा के पाठ्यक्रम का भगवाकरण करने होने का आरोपी शोर मचा रहे है | किन्तु “भगवाकरण क्या है”? यह कोई नहीं बताता | अपरिभाषित संप्रदाय...